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एक दशक की प्रतीक्षा: बीकानेर का ₹7.29 करोड़ का किडनी ट्रांसप्लांट सेंटर सिर्फ एक हस्ताक्षर का इंतजार कर रहा है2024 से सब कुछ तैयार, लेकिन अब तक एक भी ट्रांसप्लांट नहीं हुआ

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बीकानेर, राजस्थान | 18 मई 2025

पश्चिमी राजस्थान के सैकड़ों किडनी रोगी जहां आज भी डायलिसिस पर जीवन जीने को मजबूर हैं, वहीं बीकानेर के पीबीएम अस्पताल में करोड़ों की लागत से बना किडनी ट्रांसप्लांट और ऑर्गन रिट्रीवल सेंटर पूरी तरह तैयार होने के बावजूद शुरू नहीं हो पाया है। न भवन की कमी है, न स्टाफ की और न ही तकनीक की — केवल ट्रांसप्लांट अधिनियम के तहत अंतिम प्रशासनिक मंजूरी नहीं मिल पाई है।

इस सेंटर में मॉड्यूलर ऑपरेशन थिएटर, आधुनिक ICU, प्रशिक्षित स्टाफ, और ₹2.2 करोड़ की लागत वाला अत्याधुनिक 3D और 4K लैप्रोस्कोपी सिस्टम पहले ही स्थापित हो चुका है। अब तक ₹7.29 करोड़ से अधिक की सार्वजनिक व CSR राशि खर्च हो चुकी है। जयपुर से विशेषज्ञों की टीम ने मई 2024 में इसे “ट्रांसप्लांट के लिए पूर्णत: तैयार” घोषित भी कर दिया था, लेकिन अब तक एक भी ट्रांसप्लांट नहीं हो पाया है।

प्रशासनिक देरी की मानवीय कीमत

बीकानेर के मरीज आरिफ राड़, जिन्हें हाल ही में अहमदाबाद में ट्रांसप्लांट कराना पड़ा, बताते हैं — “हमने इलाज, यात्रा और ठहराव में ₹5 लाख से ज्यादा खर्च किया। सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि राजस्थान का आयुष्मान चिरंजीवी कार्ड वहां मान्य नहीं था, जबकि अन्य राज्यों के कार्ड स्वीकार किए जा रहे थे।”

10 वर्षों की समयरेखा – बनी, पर शुरू नहीं हुई

दिसंबर 2014: एसपी मेडिकल कॉलेज बीकानेर द्वारा ₹12.71 करोड़ का ट्रांसप्लांट प्रस्ताव भेजा गया।
जुलाई 2020: बीकानेर को ऑर्गन रिट्रीवल सेंटर के रूप में राज्य सरकार की मंजूरी मिली।
नवंबर 2021: राजस्थान रिन्यूएबल एनर्जी कॉर्पोरेशन से ₹5.09 करोड़ CSR फंड स्वीकृत।
2022–23: मॉड्यूलर OT, ICU, एंडोस्कोपी व डिसइंफेक्शन यूनिट तैयार (₹5.05 करोड़ खर्च)।
2023: ₹2.2 करोड़ की 3D-4K लैप्रोस्कोपी मशीन स्थापित और यूरोलॉजी विभाग में उपयोग शुरू।
अक्टूबर 2023: स्टाफ को जयपुर में ट्रांसप्लांट ट्रेनिंग दी गई।
मार्च 2024: मीडिया रिपोर्ट्स में OT के पूर्णत: कार्यशील होने की पुष्टि।
मई 2024: जयपुर से आई विशेषज्ञ टीम ने सेंटर को “ट्रांसप्लांट के लिए तैयार” बताया।

तकनीक जो जानें बचा सकती है

यह सेंटर भारत में उपलब्ध सबसे उन्नत तकनीक से सुसज्जित है। इसमें मौजूद 3D और 4K लैप्रोस्कोपी सिस्टम विशेष रूप से डोनर नेफ्रेक्टॉमी (जीवित दाताओं से किडनी निकालने) में काम आता है।

इसके लाभ:

  • बेहद सटीक और कम रक्तस्राव वाली सर्जरी
  • डोनर की तेजी से रिकवरी
  • नसों और धमनियों को जोड़ने में रियल-टाइम 3D दृश्य
  • रिकॉर्डिंग की सुविधा, मेडिकल शिक्षा व लीगल रेफरेंस के लिए

डॉ. महेश बगारिया, एसोसिएट प्रोफेसर (पूर्व IKDRC अहमदाबाद), वर्तमान में मणिपाल अस्पताल जयपुर में यूरोलॉजिस्ट हैं, कहते हैं:
“यह प्रणाली राष्ट्रीय मानकों पर खरी उतरती है। यदि सरकार अनुमति दे, तो मैं अपनी टीम सहित बीकानेर में पहला ट्रांसप्लांट निशुल्क करने को तैयार हूं।”

कैडेवर ट्रांसप्लांट और स्थानीय सुविधा का महत्व

राजेश व्यास ‘वास्तुविद’, बीकानेर निवासी और किडनी रोगी, जिन्होंने अहमदाबाद में कैडेवर सिस्टम के तहत किडनी ट्रांसप्लांट करवाया, उनके अनुभव इस देरी की पीड़ा को और गहराई से उजागर करते हैं।
राजेश जी ने इस ट्रांसप्लांट के लिए लगभग 3 साल तक इंतजार किया। हर 3 महीने में उन्हें फिटनेस जांच के लिए अहमदाबाद जाना पड़ता था — हर बार लगभग ₹20,000 का खर्च आता था। अंतिम 6 महीनों में जब उनका नंबर करीब आया, तो वे अहमदाबाद में ही रहना पड़ा — ये सब एक मध्यम वर्गीय या गरीब मरीज के लिए असंभव है।

“अगर बीकानेर में ही ट्रांसप्लांट की सुविधा होती, तो मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी जद्दोजहद आसान हो सकती थी,” उन्होंने कहा।

यदि बीकानेर में यह सेंटर शुरू होता है, तो कैडेवर डोनेशन (मृत्यु के बाद अंगदान) भी बढ़ेगा, और उसका सीधा लाभ गरीब मरीजों को मिलेगा जो जिंदा डोनर नहीं ढूंढ सकते।

जन आंदोलन की शुरुआत

17 मई 2025 को किडनी डायलिसिस एंड ट्रांसप्लांट फाउंडेशन के संस्थापक महेश देवानी ने मुख्यमंत्री श्री भजनलाल शर्मा को विस्तृत रिपोर्ट और ज्ञापन सौंपा। यह पत्र स्वास्थ्य मंत्री, स्वास्थ्य सचिव, कैबिनेट मंत्री सुमित गोदारा और स्थानीय विधायक श्री जेठानंद व्यास को भी भेजा गया।

“हमें नए भवन नहीं चाहिए। केवल जो बना है उसे शुरू कीजिए। एक मंजूरी सैकड़ों जानें बचा सकती है,” — महेश देवानी

यह क्यों जरूरी है?

यदि शुरू किया जाए, तो यह सेंटर बीकानेर, चूरू, हनुमानगढ़, श्रीगंगानगर, नागौर सहित पंजाब-हरियाणा के सीमावर्ती क्षेत्रों के मरीजों के लिए जीवनदायिनी साबित हो सकता है। यह जयपुर और अहमदाबाद पर निर्भरता भी कम करेगा।

एक ऐसा सेंटर जो पूरी तरह बन चुका है, जिसमें उपकरण भी लग चुके हैं, स्टाफ भी तैयार है — लेकिन केवल एक सरकारी हस्ताक्षर के इंतजार में बंद पड़ा है — यह मौन अन्याय है।

एक फाइल, एक हस्ताक्षर — और सैकड़ों जिंदगियां बचाई जा सकती हैं।

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